तंबाकू पर फूटा टैक्स बम

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तंबाकू पर फूटा टैक्स बम




-जर्दा पर 6 व पान मसाला पर 3 फीसदी की वृद्धि


- खैनी व बीड़ी पर भी बढ़ी एक्साइज


-स्मोकलेस तंबाकू उद्योग व किसानों में घोर निराशा


-उद्योग करेगा सरकार से राहत की गुहार


तमाम कड़े नियमों व नोटबंदी की मार झेल रहे तंबाकू उद्योग पर एक बार फिर टैक्स की गाज गिरी है। वर्ष 2017-18 के आम बजट में सभी तंबाकू उत्पादों पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी गई है। इससे खास तौर पर स्मोकलेस तंबाकू उद्योग को तगड़ा झटका लगा है। पिछले साल तंबाकू उत्पादों पर 10 से 15 फीसदी की वृद्धि की गई थी, लेकिन इस बार जाफरानी जर्दा पर 6 से 12 फीसदी और अनिर्मित तंबाकू पर 4.2 से 8.3 फीसदी एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी गई है। इसी तरह खैनी पर टैक्स की दर 6 से 12 फीसदी बढ़ गई है। इस बार बीड़ी को भी नहीं बख्शा गया। हाथ से बनने वाली बीड़ी पर एक्साइज की दर 21 रूपए प्रति हजार से बढ़ा कर 28 रूपए प्रति हजार पर पहुंच गई है। सिगरेट की बात की जाए तो 65 मि.मी. वाली सिगेरट पर एक्साइज प्रति हजार 215 से बढ़ा कर 311 रूपए की गई है। पान मसाला पर भी 3 फीसदी की वद्धि हुई है। टैक्स बढऩे से स्मोकलेस तंबाकू उद्योग और तंबाकू किसानों में गहरी निराशा है। उद्योग पर यह बिजली उस समय गिरी है, जबकि विभिन्न राज्यों में प्रतिबंध के चलते करीब 40 फीसदी बाजार छिन चुका है। तमाम तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे स्मोकलेस तंबाकू उद्योग को इस बार राहत की उम्मीद थी, लेकिन नतीजा ठीक उसके उलट निकला। ध्यान रहे कि बजट आने से पहले ही सभी किस्म की सिगरेटों के दाम बढ़ गए थे, लेकिन स्मोकलेस तंबाकू उत्पादों की कीमत जस की तस बनी हुई हैं। बाजार के हालात कंपनियों को दाम बढ़ाने की इजाजत नहींदे रहे हैं। यदि दाम नहीं बढ़ा तो उद्यमियों के लिए कारोबार को चलाना मुश्किल हो जाएगा।


तंबाकू उद्योग पर टैक्स का बोझ लादना एक परिपाटी बन गई है। कोई भी सरकार हो वह बेहिचक तंबाकू उद्योग पर टैक्स जरूर बढ़ाती है। यदि वर्ष 2012-13 से अब तक के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि तंबाकू उत्पादों पर करीब 118 फीसदी टैक्स बढ़ चुका है। वर्तमान में आम तौर पर पान मसाले का 5 रूपए वाला पाऊच बिक रहा है। यदि कोई उद्यमी प्रति मिनट 300 पाऊच निकालने वाली मशीन से 5 से 6 रूपए वाले पाऊच तैयार करता है तो उसे प्रति माह 1 करोड़ 8 लाख 21 हजार रूपए लेवी देनी होगी। यदि एक मिनट में 751 पाऊच निकालने वाली मशीन है तो 3 करोड़ 93 लाख 50 हजार रूपए का भुगतान करना होगा। इसी तरह डेढ़ रूपए से अधिक या 2 रूपए तक वाले पाऊचों पर यह लेवी दर 37 लाख 25 हजार रूपए होगी। इसी तरह जर्दा के 1 रूपए वाले पाऊच, प्रति मिनट 300 पाऊच निकालने वाली मशीन है तो हर माह 32 लाख 39 हजार रूपए लेवी देनी होगी। जबकि 2 से 3 रूपए वाले 451 पाऊच प्रति मिनट निकालने वाली मशीन पर 2 करोड़ 65 लाख 51 हजार रूपए लेवी लगेगी। ध्यान रहे कि पिछले वर्ष इस रेंज में यह सीमा 1 करोड़ 90 लाख 94 हजार रूपए थी। यानी टैक्स में 74 लाख 57 हजार रूपए का इजाफा हुआ है। 4 से 5 रूपए वाले जर्दा पाऊच को प्रति मिनट 451 पाऊच निकालने वाली मशीन पर हर माह 4 करोड़ 13 लाख 1 हजार रूपए लेवी बैठेगी, जबकि इसी कीमत वाले खैनी पाऊच के लिए 80 लाख 10 हजार रूपए देने होगें। इतना जरूर है कि खैनी के लिए मशीन की रफ्तार की बंदिश नहीं लगाई गई है।


गौरतलब है कि यह टैक्स बढोत्तरी उस समय की गई है जब स्मोकलेस तंबाकू तंबाकू उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा है। 8 नवंबर को हुई नोटबंदी की घोषणा के बाद से उद्यमियों से लेकर फुटपाथ पर पान बेचने वालों तक सभी की हालत खस्ता हो गई है। कारखाना मालिकों के पास इतना कैश नहीं है कि वे मजदूरों को उनका मेहनताना दे सकेें। ऐेसे संकट के दिनों में इतनी बड़ी टैक्स बढ़ोत्तरी बिस्तर पर पड़े बीमार का गला दबाने जैसी है। इस उद्योग की हालत अचानक ऐसी नहीं हुई है। यह सिलसिला लंबे अर्से से चल रहा है। कभी मैग्निीशियम कार्बोनेट का मामला आया तो कभी प्लास्टिक पाऊचों का। इसके बाद सचित्र चेतावनी फिर मशीन आधारित लेवी प्रणाली और इसके बाद बड़े आकार वाली सचित्र चेतावनी का आदेश जारी हुआ। इतना ही नहीं पिछले 2 दशकों से समय-समय पर विभिन्न राज्यों मेंस्मोकलेस तंाबाकू उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगता रहा है। वर्तनाम में तो प्रतिबंध के चलते देश का 40 फीसदी मार्केट इस उद्योग से छिन चुका है। विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश हो जहां किसी उद्योग के साथ ऐसा बर्ताव किया गया हो। गौरतलब है कि पान मसाला और तंबाकू उद्योग के प्रभावित होने का असर प्राकृतिक सुगंध उद्योग पर भी पड़ रहा है। कन्नौज में बनने वाली प्रकृतिक सुगंध का करीब 70 फीसदी हिस्सा पान मसाला व जर्दा उद्योग में खपता है, लेकिन उद्योगों की हलत पतली होने के कारण मांग काफी कम हो गई है। नोटबंदी के बाद से तो सुगंध उद्यमियों व गुलाब की खेती करने वाले किसानों की मुश्किलें और भी बढ़ गई है। पिछले माह कई सुगंध उत्पादकों ने बताया था कि उनका कारोबार 50 फीसदी से भी नीचे चला गया है। गांवों से किसान गुलाब शहर लेकर आते हैं, लेकिन उन्हें खरीददार नहीं मिल रहा है। खस के इत्र पर भी नकारात्मक असर पड़ा है। कन्नौज में प्रत्येक वर्ष सीजन के डेढ़ माह में खस उत्पादन जोरों पर रहता है और साल में करीब दो हजार किलो खस का निर्माण होता है। लेकिन इस बार यूपी के कई जिलों व उत्तराखंड से आने वाली खस की जड़ों की आपूर्ति में कमी आई है। जानकारों का कहना है कि जो हालत दिखाई पड़ रही है, उसमें उत्पादन गिरकर 500 किलो के आस-पास रह सकता है। गर्मियों में खस 30 से 45 हजार रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। इस बार उत्पादन कम होने से यह न सिर्फ महंगा होगा बल्कि सालाना 90 करोड़ रुपये का टर्न ओवर इस साल घटकर 20 से 25 करोड़ रुपये के आंकड़े पर पहुंच सकता है। सुगंध का कारखानों में काम कम होने से मजदूरों की भी रोजीरोटी पर असर पड़ रहा है।


प्रेक्षकों का कहना है कि योजनाबद्ध तरीके से तंबाकू को सबसे बड़ा खलनायक बना दिया। यहां तक कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग भी यहां तक कहने लगे कि तंबाकू तो शराब से भी ज्यादा खतनाक चीज है और हैरत की बात यह है कि उन्होंने सिगरेट के खिलाफ कोई बात नहींकही। विदेश के पैसे से चलने वाले तामाम एनजीओ और सरकारी पदों पर बैठे हुए कुछ अफसर सिर्फ भारत के परंपरागत स्मोकलेस तंबाकू उद्योग को ही निशाना बनाते रहे। उनकी निगाह में पान, खैनी और जर्दा जैसी चीजें ही लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। दरअस्ल यह सोच भारत के परंपरागत उद्योग के खिलाफ एक षडयंत्र की तरफ इशारा करती है। तमाम विदेशी व बहुराष्ट्रीय कंपनियां पूरी कोशिश के बाद भी इस उद्योग में अपना पांव नहीं जमा सकी हैं। यदि यह उद्योग धाराशायी होता है तो उनके लिए इस क्षेत्र में कदम रखने का रास्ता साफ हो जाएगा। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यदि खैनी,जर्दा और पान जैसी चीजें बंद हो जाएगीं तो इन उत्पादों से जुड़ा हुआ ग्राहक सिगरेट और शराब की तरफ भागेगा। ऐसी सूरत में विदेशी कंपनियों को मोटा मुनाफा काटने में आसानी हो जाएगी। यही कारण है कि समय-समय पर विभिन्न राज्यों में प्रतिबंध व तमाम तरह का उत्पीडऩ इस उद्योग के साथ किया जाता है।


तंबाकू के खिलाफ अभियान चलाने वाले बहुत से लोग यह तर्क भी देते हैं कि तंबाकू उत्पादों पर अत्याधिक टैक्स लगा देने से लोग इसका उपभोग कम कर देगें, लेकिन व्यवाहिरक रूप में इस तरह की सोच काफी खतरनाक है। इसकी वजह यह है कि एक तरफ करोड़ों लोगों के हाथों से उनकी रोजी छिन जाएगी। दूसरी तरफ नक्कालों का गोरखधंधा तेज हो जाएगा। तंबाकू नशे की चीज है और दुनियां में आज तक कोई भी नशा बंद नहीं किया जा सका है। गैरकानूनी रूप से काम करने वाले लोग ऐसे मौके का फाएदा उठाएंगे। वे घटिया माल बना कर चोरी-छिपे बेचेगें, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा और सरकार को राजस्व का नुकसान अलग से होगा। इतना ही नहीं सरकारी मशीनरियां में धरपकड़ में व्यस्त रहेंगी। उदाहरण के तौर पर जिन राज्यों में भी स्मोकलेस तंबाकू व पान मसाला पर रोक लगाई गई, वहां नकली कारखाने पकड़े गए। आए दिन इस तरह की खबरें आती रहती है। इतना ही नहींजब सिगरेट पर टैक्स की सीमा बढ़ गई तो तस्करी का माल आने लगा। हाल ही में भारी मात्रा में तस्करी की सिगरेट पकड़ी गई है। जानकारों का कहना है कि लोगों को तंबाकू के नुकसान से बचाने का बेहतर तरीका यही है कि कानूनी रूप से काम करने वाली कंपनियों को परेशान न किया जाए और उत्पादों की गुणवत्ता के मापदंड तय हो, जिनका सख्ती के साथ पालन किया जाए।


बहरहाल तंबाकू उत्पादों व पान मसाला पर की गई टैक्स वृद्धि को लेकर इस उद्योग से जुड़े लोगों में गहरी निराशा है। लोगों में बेचैनी इस उद्योग के भविष्य को लेकर भी है। तंबाकू पर जिस तरह का माहौल बना दिया गया है, उससे लोगों को लग रहा है कि आने वाले दिनों में उद्योग पर और भी मुसीबत आ सकती है। तमाम राज्य सरकारें रमेश चंद्रा कमेटी की सिफारिशों पर अमल कर रही हैं। लोगों को आशंका है कि आने वाले दिनों में सरकार सगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद (निषेध व व्यापार और वाणिज्य उत्पादन आपूर्ति तथा वितरण विनियमन) अधिनियम 2003 (कोटपा)में संशोधन के लिए कदम आगे बढ़ा सकती है।



प्रति मास प्रति पैकिंग मशीन शुल्क की वर्ष 2017-18 की नई दरें


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