अब जीएसटी पर निगाहें

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अब जीएसटी पर निगाहें






  • -तस्वीर साफ नहीं होने से उद्योग में चिंता

  • -1 जुलाई से लागू होने की संभावना

  • -तंबाकू पर 28 फीसदी टैक्स व 2 फीसदी सेस

  • -खैनी व बीड़ी को राहत मिलने की उम्मीद नहीं


आम बजट में लगे जोरदार झटके के बाद तंबाकू उद्योग पर जुलाई से टैक्स का नया बोझ पडऩे वाला है। सरकार का कहना है कि 1 जुलाई से वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू हो जाएगा। यह भी तय हो चुका है कि तंबाकू उत्पादों पर सर्वाधिक 28 फीसदी टैक्स लगाया जाएगा। साथ ही इस पर 2 फीसदी लक्जरी टैक्स भी वसूला जाएगा। ध्यान रहे कि मौजूदा समय में तंबाकू उत्पादों पर करीब 80 फीसदी से अधिक टैक्स वसूला जा रहा है। यदि जीएसटी लागू हो गया तो यह सीमा 110 फीसदी से ऊपर चली जाएगी। ऐसी सूरत में सिगरेट पर तो कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन स्मोकलेस तंबाकू उद्योग के बुरी तरह प्रभावित होने की संभावना है। करोड़ों की संख्या में रोजगार देने वाले इस उद्योग पर मंडराते संकट के चलते तमाम लोगों में बेचैनी देखी जा रही है। फुटपाथ पर पान की दुकान लगाने वाले से लेकर उद्यमी तक सभी चिंतित है। जानकारों का कहना है कि जिस तरह के हालात बनते नजर आ रहे हैं, उसमें छोटे उद्यमियों के लिए मैदान में टिके रह पाना काफी मुश्किल हो जाएगा। उद्योग में नए लोगों की इंट्री तो बहुत दूर की बात है। प्रेक्षकों का कहना है कि वर्ष 2017 सिगरेट के लिए भले ही अच्छा हो, लेकिन स्मोकलेस तंबाकू उद्योग के लिए यह मुसीबत का पहाड़ लेकर आया है।


उल्लेखनीय है कि नवंबर में तंबाकू उद्योग पर नोटबंदी की मार पड़ी। लोगों की हालत खस्ता थी कि फरवरी में आए आम बजट में जाफरानी जर्दा पर 6 से 12 फीसदी और अनिर्मित तंबाकू पर 4.2 से 8.3 फीसदी एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी गई। खैनी पर 6-12 फीसदी की बढ़ोत्तरी की गई। इस बार बीड़ी को भी नहीं बख्शा गया। हाथ से बनने वाली बीड़ी पर एक्साइज की दर 21 रूपए प्रति हजार से बढ़ा कर 28 रूपए प्रति हजार कर दिया गया। इन दोनों बड़े झटकों से पहले बड़े आकार वाली सचित्र वैधानिक चेतावनी का नियम लागू हुआ था। इसके चलते उद्यमियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। स्मोकलेस तंबाकू उद्योग को एक के बाद एक नए संकट का सामना करना पड़ रहा है। उद्यमियों के लिए मुनाफा कमाना तो दूर की बात है, उनके लिए कारोबार का अस्तित्व बचाना मुश्किल हो रहा है।


जीेएसटी को लेकर लोगों में तरह की तरह की चर्चाएं हैं। किसी को लगता है कि तंबाकू के जीएसटी की परिधि मेंं आ जाने से मुश्किलें कम हो जाएंगी तो कई लोग ऐसे भी हैं, जिनका तर्क है कि तंबाकू को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया तो ठीक रहेगा। उधर सरकारी सूत्रों का कहना है कि यह तय हो चुका है कि तंबाकू जीएसटी के दायरे में आएगी। इतना ही नहींस्मोकलेस तंबाकू के खिलाफ अभियान चलाने वाले कई संगठनों ने सरकार से कहा है कि सिगरेट समेत सभी तंबाकू उत्पादों पर एक समान टैक्स लगाया जाए, क्योंकि सिगरेट की अपेक्षा स्मोकलेस तंबाकू उत्पादों पर कम टैक्स लिया जाता है। उन्होंने तंबाकू पर सबसे ऊंची यानी 28 फीसदी दर से टैक्स लगाने का प्रस्ताव किया है। यह लाबी तर्क दे रही है कि तंबाकू बाजार में सिगरेट की हिस्सेदारी मात्र 11 फीसदी है, जबकि उससे राजस्व 87 फीसदी मिलता है। जबकि स्मोकलेस तंबाकू उद्योग की हिस्सेदारी 89 फीसदी है और उससे सिर्फ 13 फीसदी कराधान प्राप्त होता है। हालांकि तंबाकू विरोधी लाबी का यह काफी पुराना तर्क है, लेकिन अब सरकार उस दिशा में बढ़ती हुई दिखाई पड़ रही है। यदि ऐसा न होता तो हाथ से बनाई जाने वाली बीड़ी पर 33 फीसदी टैक्स नहीं बढ़ाया जाता और खैनी जैसे गरीबों के नशे पर 6-12 फीसदी की बढ़ोत्तरी न होती। कहने का अर्थ यह कि अब बीड़ी और खैनी जैसे उत्पादों को भी टैक्स के मामले में कोई राहत नहीं मिलने वाली है। बहरहाल 4 मार्च को जीएसटी परिषद की जो बैठक हुई उसमेंं इस नई अप्रत्यक्ष कर प्रणाली के लिए प्रस्तावित दो प्रमुख विधेयकों- केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) और एकीकृत जीएसटी (आईजीएसटी) कानून के अंतिम मसौदे को मंजूरी दे दी गई है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि राज्य जीएसटी (एसजीएसटी) के मसौदे को मंजूरी भी जल्दी मिलने वाली है। यह विधेयक राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदित किया जाएगा। एसजीएसटी के साथ यूटी.जीएसटी सीजीएसटी विधेयक की तर्ज पर होगा और जीएसटी परिषद 16 मार्च को बैठक में इस पर विचार करेगी। सीजीएसटी, आईजीएसटी और यूटी.जीएसटी कानून को 9 मार्च से शुरू होने वाले बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में रखा जाएगा। जेटली ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि जीएसटी 1 जुलाई से लागू हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि शिखर दर अपेक्षाकृत ऊंची रखी जाएगी, लेकिन लागू की जाने वाली दरें 5,12, 18 और 28 ही रहेंगी। अब मसला यह है कि राज्य किस तरह का स्लैब तय करते हैं? इस मसले को लेकर तंबाकू उद्योग के लोगों में काफी उहापोह है, क्योंकि जीएसटी के फैसले का सर्वाधिक असर स्मोकलेस तंबाकू उद्योग पर ही पडऩे वाला है।


गौरतलब है कि यह सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है जब उद्योग की हालत पहले से ही खस्ता है। महाराष्ट्र, हरियाणा व हिमांचल प्रदेश समेत कई राज्यों में प्रतिबंध लगा हुआ है। दिल्ली समेत कुछ राज्यों में अदालती स्टे के चलते स्मोकलेस तंबाकू उत्पाद बिक रहे हैं। जानकारों का कहना है कि देश की तकरीबन 40 से 45 फीसदी मार्केट से तंबाकू को वंचित कर दिया गया है। ऐसे में जीएसटी के तहत टैक्स की सीमा और बढ़ जाती है तो उद्योग के भविष्य के बारे में सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। कई लोग यह भी कह रहे हैं कि रमेश चंद्रा कमेटी की सिफारिशें किस्तों में लागू की जा रही है। वर्ष 2014 में गठित इस कमेटी ने तंबाकू पर नकेल कसने के लिए कई सिफारिशें की थीं,जिसमें एक यह भी थी कि तंबाकू उत्पादों पर टैक्स इतना बढ़ा दिया जाए कि लोग उसे खरीदना ही बंद कर दें। साथ ही खुली सिगरेट की बिक्री रोकने का सुझाव दिया गया था।


इसमें सिगरेट व अन्य तंबाकू उत्पाद (निषेध व व्यापार और वाणिज्य उत्पादन आपूर्ति तथा वितरण विनियमन) अधिनियम 2003 (कोपटा) में संशोधन की सिफारिश भी की गई है। दरअस्ल कोटपा में सभी तंबाकू उत्पादों के साथ सिगरेट भी शामिल है। जब खाद्य संरक्षा अधिनियम के तहत स्मोकलेस तंबाकू पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो अदालत राज्य सरकार के फैसलों पर रोक लगा देती है। साथ ही सुझाव भी देती है कि तंबाकू पर कोटपा के तहत कार्रवाई की जा सकती है। अब यदि कोटपा लगाया जाता है तो उसमें सिगरेट भी लपेटे में आ जाएगी। इसीलिए कोटपा में संशोधन की कोशिशें की जा रही हैं। पिछले दिनों सरकार में इस विषय पर विचार-विमर्श भी हुआ लेकिन, उद्योग, पान वालों को किसानों के विरोध के चलते मामला रूक गया। अब संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में इसके लिए कोशिशें तेज हो सकती हैं। रमेश चंद्रा कमेटी की सफारिशें ऐसी हैं कि यदि इनका 50 फीसदी हिस्सा भी लागू कर दिया गया तो भारत के परंपरागत यानी स्मोकलेस तंबाकू उद्योग को ताला लग जाएगा। समिति ने सिफारिश की है कि कम से कम 25 साल की उम्र वाले युवाओं को ही तंबाकू उत्पाद उपभोग करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जबकि वर्तमान में इसके लिए न्यूनतम उम्र 18 साल है। साथ ही उसका कहना है कि सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद कानून सीओटीपीए- 2003 की धारा 20 के अंतर्गत पैकेट पर निकोटिन और राल (टार) सामग्री का उल्लेख नहीं करने पर जुर्माने को 5000 रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपए किया जाए। इसके अलावा समिति ने खुली सिगरेट की बिक्री बंद करने समेत अन्य कई सिफारिशें की हैं। कुल मिलाकर स्मोकलेस तंबाकू उद्योग चारों तरफ से घिरता हुआ दिखाई पड़ रहा है। अब तक जो भी संकट आए, उन्हें तो उद्योग ने झेल लिया, लेकिन आने वाला समय और मुश्किल भरा रहने वाला है। सरकार के समक्ष कई बार इंसाफ की गुहार कर चुके तंबाकू उद्यमी अब देखो और इंतजार करो की रणनीति पर चल रहा है। लोगों की चिंता इसलिए भी है कि जरूरी नहींज्यादा टैक्स देने के बाद उनकी मुश्किलें आसान हो जाएगी। जीएसटी के बाद भी प्रतिबंध, कोटपा में संशोधन व आए दिन नए-नए नियमों का सामना करना पड़ सकता है।