लज्जत व क्वलिटी पहचान है होरीलाल की

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लज्जत व क्वलिटी पहचान है होरीलाल की

राजधानी की 45 साल पुरानी पान की दुकान














दिल में हौसला और सच्ची लगन हो तो सपनों को साकार किया जा सकता है। तमाम झंझावातों और चुनौतियों से मुठभेड़ करते हुए होरी लाल चौरसिया ने एक ऐसी ही मिसाल पेश की है। जो लोग चौरसिया जी के जीवन के बारे में जानते हैं, उनके लिए वे प्रेरणास्रोत से कम नहीं हैं। करीब 45 साल पहले राजधानी के अशोक विहार में फुटपाथ पर तख्ता बिछाकर पान के बीड़े लगाने वाले होरीलाल जी की आज 4 बड़ी और शानदार दुकानें हैं। दिल्ली की इन मशहूर दुकानों पर सुबह से लेकर रात तक ग्राहकों की लाइन लगी रहती है। इनकी दुकानों पर शहर के बड़े से बड़े रईस पान खाने के लिए आते हैं। सभी दुकानों में एसी और सीसी कैमरे लगे हुए हैं। इनकी एक दुकान अशोक विहार दूसरी अग्रवाल मिलेनियम टावर, तीसरी पीतमपुरा मेट्रो हाइट्स और चौथी गर्ग ट्रेड सेंटर रोहणी के जी थ्री एस माल में है।

होरीलाल जी सन 1970 में यूपी के प्रतापगढ़ जिले से दिल्ली आए थे। शुरू में कुछ दुकानदारों के यहां नौकरी की। फिर अशोक विहार में तख्ते...पर पान की दुकान लगाई। उनकी मेहनत और ईमानदारी का नतीजा था कि ग्राहकों की तादाद लगातार बढ़ती चली गई। जब ग्राहक बढ़े तो इनकी हिम्मत भी बढ़ी। फिर इन्होंने एक खोखा लिया। होरीलाल की मेहनत रंग लाने लगी और जल्द ही डीडीए मार्केट में एक दुकान ले ली। इस स्तर पर पहुंच जाने के बाद इनका नाम काफी चर्चित हो गया। इनके पान के बीड़ों का स्वाद और फ्लेवर ग्राहकों को दूर-दूर से खींच कर लाने लगा। इनकी दुकान पर जो व्यक्ति एक बार आ जाता तो उसका बार-बार आना तय था। कमाल की बात यह कि होरीलाल ने कभी अपनी दुकान पर गुटखा नहीं रखा, जबकि आमतौर पर ज्यादा कमाई के लिए पान की दुकान वाले गुटखा व अन्य सामग्री भी दुकान पर रखते हैं। इन्होंने इसके उलट अपना सारा ध्यान पान पर ही केेंद्रित किया जिसके कारण था कि इन्हें कामयाबी मिलती गई। लोग इनकी दुकान पर कुछ और नहीं बल्कि सिर्फ पान खाने आते थे।

जमीन से ऊपर उठने वाले होरीलाल ने सिर्फ अपनी नहीं बल्कि अपने गांव वालों की भी फिक्र की और उन्हें अपने व्यवसाय से जोड़ा। वर्तमान में होरीलाल के नाम से एक कंपनी चल रही है, जिसमें करीब 25-30 लोग हैं। इन लोगो को होरी लाल ने न सिर्फ काम दिया बल्कि कारोबार में हिस्सेदारी देकर उन्हें मालिक भी बनाया। कंपनी होने के साथ-साथ होरीलाल पान एक कम्यून की तरह काम कर रहा है। इन्हें पूरा सम्मान भी मिला हुआ है। मालिकाना हक और सम्मान पा कर सभी लोग पूरी जी जान से मेहनत करते हैं। यह इन सभी लोगो का परिश्रम है कि आज होरीलाल का नाम समूची राजधानी में है। तमाम बड़े-बड़े नेता व कलाकार होरीलाल का पान खाने उनकी दुकान पर आते हैं. होरीलाल के पुत्र श्री चेतन चौरसिया भी इस समय कारोबार में पूरी तल्लीनता से लगे हुए हैं। दिल्ली में पले बढ़े होने के कारण उनकी सोच भी आधुनिक है। वर्ष 2011 से चेतन बड़े कार्पोरेट घरानों के उत्सवों में पान की स्टाल का ठेका लेते हैं। इस समय स्थिति यह है कि बड़े से बड़े उद्योगपति अपने समारोह आदि के लिए होरीलाल के केेंद्र से स्वंय संपर्क करते हैं।

होरीलाल के पान की विशेषताओं पर बाकायदा एक ग्रंथ लिखा जा सकता है। सिर्फ मीठे पान की बात की जाए तो वर्तमान में उनकी दुकान पर करीब 25 किस्म के पान मिलते हैं। इनमें चाको क्रंची, चाकलेट, बटरस्काच और घुंड़ी आदि की मांग ज्यादा होती है। घुंडी पान काफी खास है। चंदन फ्लेवर वाला यह पान 3 पत्तों से बनता है और हल्का मीठा होता है। होरीलाल के यहां मीठे में कत्था व चूने का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता है. इसे कोई भी खा सकता है। इनके यहां मीठा पान 20-30 रूपए तक का है। इसके अलावा चुस्की, मिनाक्षी, मगही, बनारसी, स्ट्राबरी, सिंघाड़ा व खजूर पान आदि मशहूर है। खास बात यह है कि जिन पानों में कत्थे का इस्तेमाल होता है, उसमें ड्राईफ्रूट व मुसली का मिश्रण किया जाता है। हैरत की बात यह है कि मुसली को बारीक तरीके से पीसना आसान नहीं है, लेकिन कत्थे में मिली होने के बावजूद इसे कोई पकड़ नहीं सकता है। होरीलाल ने इसकी पिसाई के लिए विशेष व्यवस्था कर रखी है। इन मिश्रणों से न सिर्फ कत्थे का स्वाद अच्छा हो जाता है, बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी फाएदेमंद होता है।

इनके यहां तंबाकू का पान खाने वालों की भी भीड़ लगी रहती है। ज्यादातर बाबा 120, 160, तुलसी डबल ज़ीरो, जगत, भोला और रत्ना 300 की मांग होती है। दुकान पर काम करने वाले लोग बताते हैं कि ग्राहकों का एक बड़ा तबका सादी पत्ती की मांग करता है। बेहतरीन खुशबू वाली सादी पत्ती स्वंय होरी लाल तैयार करते हैं. यह थोड़ा झंझट वाला काम है, क्योंकि इसे तकरीबन हर दिन तैयार करना होता है। ज्यादा समय तक रखने से यह खराब हो जाती है और इसका फ्लेवर भी नष्ट हो जाता है। कई बार ग्राहक अलग से भी सादी पत्ती की मांग करते हैं। यह पत्ती इतनी खास है कि जब पान के बीड़े में इसे डालने के लिए डिब्बा खोला जाता है तो आस-पास का वातावरण महक जाता है। इनकी दुकान पर ज्यादातर केटीसी की चटनी चलती है। साथ ही नौरत्न और मिनाक्षी चटनी की भी काफी मांग होती है। साथ ही किवाम में नौरत्न की मांग ज्यादा है।

होरीलाल जी ने जिन लोगो को भी अपने कारोबार से जोड़ा, उन्हें बाकायदा ट्रेनिंग दी। अपने गंांव से लोगो को लाकर पान लगाने का तरीका समझाया। वे नए लोगो को ट्रेनिंग के बाद ही काउंटर पर बैठने की अनुमति देते हैं। उनका कहना है कि पान के पत्ते पर कत्था व चूना की मात्रा को समझना और पान लगाने में स्पीड होना जरूरी है। अक्सर पान की दुकान वाले जल्दबाजी में कभी-कभी कत्था -चूना की मात्रा को असंतुलित कर देते हैं, जिसके कारण पान का स्वाद खराब हो जाता है। होरीलाल का मानना है कि मीठा पान लगाने के लिए 2 माह की ट्रेनिंग काफी होती है, लेकिन तंबाकू के पान लगाना थोड़ी टेढ़ी खीर है। व्यक्ति में दिलचस्पी हो तो इसे जल्दी सीख सकता है, लेकिन पूरी तरह हाथ साफ करने में करीब 5 वर्ष लग जाते हैं, क्योंकि कत्था-चूना आदि की मात्रा को समझना जरूरी होता है। और जबतक स्पीड न आए तब तक मामला अधूरा ही होता है। जाहिर है कि इस काम में करीब 4-5 वर्ष लग जाते हैं। होरीलाल की खास बात यह है कि वे अपनी दुकान के काउंटर पर लड़कों को तभी बिठाते हैं, जब वे पूरी तरह निपुण हो जाते हैं।

वास्तव में होरीलाल की दुकान पर बैठे लड़कों को देख कर लगता है कि जैसे उनके हाथ में कोई मशीन फिट हो। वे बात भी करते रहते हैं और उनका हाथ एक तरह से चलता रहता है। हो भी क्यों न ट्रेनिंग जो होरी लाल जी ने दी है। इनकी दुकान की एक खास बात यह है कि मालिक और कर्मचारी का अंतर ही नहीं पता चलता है। होरीलाल क ी तरफ से उन्हें इतना सम्मान मिलता है कि उनके चेहरे पर अजब का आत्मविश्वास रहता है। जिस तरह की विनम्रता होरी लाल में दिखाई पड़ती है, ठीक वही भाव काउंटर पर बैठे लड़कों का भी रहता है। सभी से अच्छा बर्ताव करने की सीख उन्हें होरी लाल से ही मिली है। भीड़ होने के बावजूद कुछ ग्राहक अक्सर जल्दबाजी दिखाते हैं तो वे उन्हें अपने खास अंदाज में धीरज रखने की सलाह भी देते हैं। इसी व्यावहार का नतीजा है कि होरीलाल की दुकान पर जो कोई एक बार जाता है तो बार-बार आता है। होरीलाल ने पान में इस्तेमाल होने वाले सामानों की गुणवत्ता को लेकर आज तक कोई समझौता नहीं किया। वस्तुएं चाहे जितनी महंगी हो गई हों, उन्होंने सबसे अच्छी क्लालिटी का इस्तेमाल किया। जब वे खोखा लगाते थे तब भी उच्च श्रेणी का सामान इस्तेमाल करते थे और आज भी वह सिलसिला जारी है। गुणवत्ता वाली वस्तुएं इस्तेमाल होने के कारण पान का स्वाद और भी बढ़ जाता था। अपनी कड़ी मेहनत और ईमानदारी के कारण ही आज होरीलाल का नाम राजधानी में मशहूर है। पान खाने का हर शौकीन व्यक्ति उनके नाम से परिचित है। वास्तव में होरी लाल को सिर्फ पान की बड़ी दुकान नहीं बल्कि एक सफल कारोबारी और अच्छे इंसान के रूप में देखना चाहिए। जो लोग कामयाबी की बुलंदिया छूना चाहते हैं, उनके लिए वे एक आदर्श हैं।


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